मुंबई: अभिषेक शर्मा की रिपोर्ट
आर्थिक राजधानी मुंबई में आम गरीबों और जरूरतमंदों के इलाज का मुख्य जरिया माने जाने वाले बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) और सरकारी अस्पताल इन दिनों खुद गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। शहर के प्रमुख अस्पतालों में बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं, जीवन रक्षक दवाओं और जांच उपकरणों के आभाव के कारण दूर-दराज से आने वाले मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
क्या है जमीनी हकीकत?
अस्पतालों की ओपीडी (OPD) में सुबह से लंबी-लंबी कतारों में खड़े रहने के बावजूद कई मरीजों को डॉक्टर की सलाह के बाद बाहर से महंगी दवाएं खरीदने और प्राइवेट लैब में महंगे टेस्ट कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसके अलावा, कई वार्डों में साफ-सफाई की कमी और समय पर इलाज न मिलने के कारण मरीजों की जान पर बन आती है। आपातकालीन सेवाओं (Emergency Wards) में बेड की कमी के कारण एक-एक बेड पर दो-दो मरीजों को लिटाया जा रहा है, जो प्रशासन के दावों की पोल खोलता है।
नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आक्रोश:स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि स्वास्थ्य बजट के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर आम जनता को सिवाय धक्के खाने के कुछ नहीं मिल रहा है। अस्पताल प्रशासन की उदासीनता और अधिकारियों की मनमानी के कारण गरीब जनता का शोषण धड़ल्ले से जारी है।
जनता की सख्त मांग:
सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने मांग की है कि सभी सरकारी व मनपा अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की शत-प्रतिशत उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, जाँच मशीनों को दुरुस्त किया जाए और लापरवाही बरतने वाले लापरवाह अधिकारियों पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।



